Sandeep Chavan
जब परिणाम अनिश्चित हों और हर निर्णय की कोई न कोई कीमत हो, तब उत्तरदायित्व के साथ कर्म कैसे किया जाए? गीता: अ गवर्नन्स मॉडल ऑफ रियलिटी श्रीमद्भगवद्गीता का एक मौलिक दार्शनिक और संरचनात्मक पुनर्पाठ है। संदीप चव्हाण यहाँ गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ, नैतिक उपदेश या आध्यात्मिक सांत्वना के रूप में नहीं, बल्कि अपूर्ण जानकारी और अपरिहार्य परिणामों के बीच विवेकपूर्ण निर्णय लेने की शासन-संरचना के रूप में समझते हैं। इस दृष्टि में अर्जुन का संकट दुर्बलता नहीं, बल्कि जागरूकता और कर्म-क्षमता के बीच उत्पन्न असंतुलन है। कृष्ण का संवाद इस असंतुलन को दूर करने के लिए धर्म, कर्म, ज्ञान, अनासक्ति, आस्था, गुण और त्याग की अवधारणाओं को नई संचालनगत स्पष्टता देता है। यहाँ धर्म भूमिका और उत्तरदायित्व के बीच संरेखण है; अनासक्ति निष्क्रियता नहीं, परिणाम पर मनोवैज्ञानिक निर्भरता से मुक्ति है; और त्याग कर्तव्य से पलायन नहीं, बल्कि अहं-केंद्रित स्वामित्व का परित्याग है। अठारह अध्यायों में यह पुस्तक व्यक्तिगत दुविधा से लेकर संस्थागत नैतिकता, नेतृत्व, निर्णय-क्षमता और साझा वास्तविकता में दूर तक फैलने वाले परिणामों तक विचार करती है। यह निश्चित विजय या सरल समाधान का आश्वासन नहीं देती। इसका प्रश्न अधिक गंभीर है: पूर्ण स्पष्टता के बिना भी मनुष्य सजग, स्थिर और उत्तरदायी कैसे बना रहे? दर्शन, नेतृत्व, नीति, शिक्षा तथा मानवीय निर्णय-प्रक्रिया में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह एक विचारशील और स्वतंत्र व्याख्या है। 6