Sandeep Chavan
क्या ईगो सचमुच मनुष्य का दुश्मन है, या वह किसी गहरे असंतुलन का पहला संकेत है?हम अक्सर घमंड, हठ, आलोचना से बचने और अपनी गलती स्वीकार न करने को ईगो कह देते हैं। लेकिन किसी व्यवहार को नाम दे देना उसके पीछे की प्रक्रिया को समझ लेना नहीं है। एक सफल व्यक्ति अपने पुराने निर्णयों से चिपका क्यों रहता है? बुद्धिमत्ता कभी सीखने के बजाय पहचान के बचाव में क्यों लग जाती है? आत्मविश्वास कब रक्षात्मक कठोरता बन जाता है?ईगो - द सिग्नल बिफोर कोलैप्स में संदीप चव्हाण इन प्रश्नों की संरचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। चव्हाणियन ईगो डायनेमिक्स के अनुसार पहचान अपने आप में कोई दोष नहीं है। वह अनुभव, संबंध, सफलता, मान्यता और सहभागिता से बनती है तथा जीवन में उपयोगी भूमिका निभाती है। दबाव तब उत्पन्न होता है जब बदलती वास्तविकता के सामने वही पहचान संशोधित होने से इनकार करने लगती है। इस टकराव में ईगो एक संकेत के रूप में उभरता है। आगे क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति उस संकेत से सीखेगा या अपनी पुरानी पहचान की रक्षा में और कठोर होता जाएगा।पाँच भागों और अठारह अध्यायों में पुस्तक पहचान के निर्माण, ज्ञान-ईगो, निश्चितता के मुखौटे, ट्रिगर, उधार ली गई बुद्धिमत्ता, रक्षात्मक विस्तार, पतन और पुनर्गठन की पड़ताल करती है। पुस्तक का अंतिम प्रश्न ईगो को मिटाना नहीं, बल्कि ऐसी परिपक्वता को समझना है जिसमें पहचान अपनी निरंतरता बनाए रखते हुए बदल सके।यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो मानवीय व्यवहार, नेतृत्व, शिक्षा, संबंधों और सामाजिक संरचनाओं को नैतिक लेबल से आगे जाकर समझना चाहते हैं। यह किसी व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक निदान नहीं, बल्कि अध्ययन, आत्म-अवलोकन और आगे के अनुसंधान के लिए प्रस्तुत एक वैचारिक ढाँचा है। 6